Democracy

देव अच्छाईका प्रतिक. दानव बुराईका प्रतिक. जबसे संसार बना हैं तबसे देव और दानवके बीच संघर्ष होता रहा हैं. जब दानवोंको विजय प्राप्त होती, पराजित देव पुनः अपनी शक्तिको संगठित करनेका प्रयास करते. जब देवको विजय प्राप्त होती, पराजित दानव भी पुनः शक्ति प्राप्त करनेका प्रयास करते. अच्छाई और बुराईके बीच टकराव एक प्राकृतिक क्रिया हैं.

 

अच्छे पुरुष – सत्यनिष्ठ, अहिन्सावादी, चोरी अथवा बलपूर्वक दूसरोंका धन न हड़पनेवाले, आवश्यकतासे अधिक संग्रह न करनेवाले, सभीको आदर प्रदान करनेवाले, सभीको अभय प्रदान करनेवाले, सभीको निस्वार्थ सहयोग प्रदान करनेवाले, सबसे प्रेम करनेवाले, सरल प्रकृतिवाले, ज्ञानी पुरुषोंका संग करनेवाले, सहस्त्रों मूर्खोंके बदले एक पण्डितको ही अपने साथ रखनेवाले, राजकार्योंके विषयमें सबके साथ मिलकर विचार करनेवाले, विपरीतदर्शी मूर्खोंसे सलाह न लेनेवाले, लोभी-लालची मनुष्योंको आश्रय न देनेवाले, विषयोंमें अनासक्त, चञ्चलचित्त मनुष्योंसे सलाह न लेनेवाले, पुरुषार्थी, कार्य निश्चित करनेके बाद उसे शीघ्र प्रारम्भ कर देनेवाले व् उसमे विलम्ब न करनेवाले, किसी गुढ़ विषय पर अकेले ही विचार करनेवाले, कार्य पूर्ण हो जानेपर ही सार्वजनिक करनेवाले व् भावी कार्यक्रमको पहले प्रकट न होने देनेवाले, गुप्त मन्त्रणाको सुरक्षित रखनेवाले, माङ्गलिक आदि कार्योंका अनुष्ठान करनेवाले, कई कठिनकार्य एक ही साथ आरम्भ न करदेनेवाले, कुलीन, विनयी, धैर्यवान,  उत्साही, निडर, बुद्धिमान, संतोषी, लज्जावान (पाप करनेसे घृणा करने वाले) तथा उत्तम स्वभावके होते हैं.

 

बुरे मनुष्य – झूठे, स्वार्थी, कामी, भोगी, लोभी, अहंकारी, बैरी, झगडालू, क्रोधी, हिंसक, अत्याचारी, बलपूर्वक अथवा छलसे दूसरोंका धन स्त्री व् जमीन हड़पनेवाले, चोर, आवश्यकता से अधिक संग्रह करने वाले, व्यसनी, तथा अधम स्वभाव के होते हैं.

 

यथा राजा तथा प्रजा. जैसा राजा होता हैं वैसे ही प्रजा होती हैं, ये शाश्वत कहावत हैं. चाणक्यने अपने बुद्धिचातुर्य व् संकल्पशक्तिके बलसे एक बालकको तराशकर राजगद्दी पर प्रतिष्ठित किया था. विक्रमादित्य और चाणक्यकी छात्रछायामें प्रजा सुखी थी.

 

रावण को समाप्त करने हेतु, साक्षात राम चाहिये. सुशासन चाहिये.

 

संसार में राजाको परमात्माके समकक्ष माना गया हैं. राजामें परमात्माकी शक्तियां वास करती हैं अर्थात राजा सर्वशक्तिमान होता हैं.

 

अच्छा शासन ही सभी समस्याओंका निदान हैं. आवश्यकता हैं अच्छाईको संगठित करनेकी. अच्छाई का प्रचार प्रसार करनेकी. अच्छाई चुननेकी संकल्पशक्ति जाग्रत करनेकी. अच्छे मनुष्योंको राजगद्दी पर प्रतिष्ठित करनेकी. शपथ ले – सच्चाई का साथ देने की.

 

सहज प्राप्त धनबल और विशाल वैभव के कारण उच्छ्ङ्खल और घमण्डी मनुष्य मर्यादा का उल्लङ्नकर संपर्ण सन्सारका संहार करनेको तत्पर हैं. आज संसारमें प्रजातान्त्रिक प्रणाली प्रचलित हैं. प्रजातान्त्रिक प्रणाली – प्रजाके लिये, प्रजाके द्वारा, प्रजाकी प्रणाली हैं और सर्वशक्तिमान हैं. प्रजातंत्रमें अच्छा और बुरा चुनने की शक्ति प्रजा के पास हैं, अपने-आप द्वारा अपने-आपको दुर्दशा से बचाए. अवसर को व्यर्थ न जाने दे. इसे सफल बनाने हेतु, अहंकार और मोह त्यागकर सच्चाईसे केवल अच्छेमनुष्यों का चुनाव करना हैं.

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The Most Beautiful City InThe World – Udaipur

 

Udaipur and its surroundings are most beautiful in the world.

Forts, Palaces, Havelies, Temples, Lakes, Gardens, Mountain terrains, Sanctuary, Culture, Heritage, Hospitality and food

Tour it, Experience it, feel it..

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बुढ़ापा दूर रखनेवाला संजीवनी पेय – Keep away Old Age

बुढ़ापा दूर रखनेवाला संजीवनी पेय

प्रकृतिके नियमानुसार बुढ़ापा आना तो निश्चित हैं, पर उचित आहार-विहार और स्वास्थ्यरक्षक नियमोंका पालन करके इसे यथासम्भव दूर रखा जा सकता हैं, इस दिशामें एक सफल सिद्ध अनुभूत प्रयोग यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा हैं-

शरीरशास्त्री वैज्ञानिकोंका मानना हैं कि जबतक शरीरके कोषाणुओंका पुनर्निर्माण ठीक-ठीक होता रहेगा, तबतक बुढ़ापा दूर रहेगा और शरीर युवा बना रहेगा. जब इस प्रक्रियामें विघ्न पड़ता हैं और कोषाणुओंके पुनर्निर्माणकी गति मन्द होने लगती हैं, तब शरीर बूढ़ा होने लगता हैं. इस वैज्ञानिक विश्लेषणसे एक निष्कर्ष यह निकला कि यदि विटामिन , विटामिन सी और कोलीन – ये तीन तत्व पर्याप्त मात्रामें प्रतिदिन शरीरको आहारके माध्यमसे मिलते रहें तो शरीरके कोषाणुओंका पुनर्निर्माण ठीकसे होता रहेगा और जबतक यह प्रक्रिया ठीक-ठीक चलती रहेगी, तबतक बुढापा दूर रहेगा. बुढ़ापा आयेगा जरुर, पर देरसे आयेगा.

इस निष्कर्ष पर विचार करके पूनाके श्री श्रीधर अमृत भालेरावने यह निश्चय किया कि इन तीनों तत्वोंको औषधिके माध्यमसे प्राप्त करनेकी अपेक्षा प्राकृतिक ढंगसे, आहारद्वारा प्राप्त करना अधिक उत्तम और गुणकारी रहेगा. लिहाजा काफी खोजबीन और परिश्रम करके वे इस निष्कर्षपर पहुँचे कि विटामिन अंकुरित गेहूंसे, विटामिन सी नीबू, शहद और आँवलेसे एवम् कोलीन मेथीदानासे प्राप्त किया जा सकता हैं. इन तीनों पदार्थों का सेवन करनेके लिये उन्होंने यह प्रयोग बनाया-

४० ग्राम अर्थात ४ चम्मच (चायके) गेहूं और १० ग्राम अर्थात १ चम्मच (चायका) मेथीदाना – दोनों को ४-५ बार स्वच्छ पानीसे अच्छी तरह धो लें, ताकि इनपर यदि कीटनाशक औषधियोंके छिडकावका प्रभाव हो तो दूर हो जाय. धोनेके बाद आधा गिलास पानीमें डालकर चौबीस घंटेतक रखें. चौबीस घंटे बाद पानीसे निकालकर एक गीले तथा मोटे कपड़ेमें रखकर बांध दें और चौबीस घंटेतक हवा में लटकाकर रखें. गिलासका पानी फेकें नहीं, इस पानीमें आधा नीबू निचोड़ कर दो ग्राम सोंठ का चूर्ण डाल दें. इसमें दो चम्मच शहद घोलकर प्रातः खाली पेट पी ले. यह पेय बहुत शक्ति वर्धक, पाचक और स्फूर्ति दायक हैं, इसीलिए  इसका नाम श्री भालेराव् ने संजीवनी पेय रखा है. चोबीस घंटे पूरे होने पर हवा में लटके कपड़े को उतार कर खोलें और गेहूं तथा मेथीदाना एक प्लेट में रखकर इसपर पिसी कालीमिर्च और सेंधा नमक बुरक दें. गेहूं और मेथीदाना अंकुरित हो चूका होगा. इसे खूब चबा-चबाकर प्रातः खाएं. यदि इसे मीठा करना चाहें तो कालीमिर्च और नमक न डालकर गुड मसलकर डाल दें, शक्कर न डालें. यह मात्रा एक व्यक्ति के लिये हैं.

इस प्रयोगका सेवन करने से तीनों तत्व तो शरीरको प्राप्त होते ही हैं, साथ ही एन्जाइम्स, लाइसिन, आइसोल्युसिन, मेथोनाइन आदि स्वास्थ्यवर्धक पौष्टिक तत्व भी प्राप्त होते हैं. यह प्रयोग सस्ता भी हैं और उपयोग में सरल भी, इसमें आश्चर्यजनक शक्ति हैं, यह स्फूर्ति और पुष्टि देनेवाला हैं.  

इस प्रयोगको प्रौढ़ ही नहीं वृद्ध भी कर सकते हैं. यदि दांत न हों या कमजोर हों तो वे अंकुरित अन्न चबा नहीं सकते, ऐसी स्थितिमें निम्नलिखित प्रयोगका उपयोग करना चाहिये-

४० ग्राम अर्थात ४ चम्मच (चायके) गेहूं और १० ग्राम अर्थात १ चम्मच (चायका) मेथीदाना-दोनों को ४-५ बार स्वच्छ पानीसे अच्छी तरह धो लें, ताकि इनपर यदि कीटनाशक औषधियोंके छिडकावका प्रभाव हो तो दूर हो जाय. धोनेके बाद आधा गिलास पानीमें डालकर चौबीस घंटेतक रखें. चौबीस घंटे बाद पानीसे गेहूँ तथा मेथीदाना निकालकर सुखा ले. गिलासके पानीमें आधा नीबू निचोड़ कर दो ग्राम सोंठ का चूर्ण डाल दें. इसमें दो चम्मच शहद घोलकर सुबह पी ले. यह क्रिया पुरेदिनमें चार बार करे. सुखे गेहूँ तथा मेथीदाना पीसाने हेतु रखे गए गेहूँ में मिला दें.

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Yoga-One must know all about it

In general YOGA means-Integrator, proficiency of deeds, abdication of all anxiety and becoming fearless, restraining the emotions of mind, union of Jivatma  to Parmatma and many more. Yoga is a way of life. By practicing YOGA in life, one can lead a happy, healthy and successful life.
Different texts and many Masters have defined YOGA in several ways. Due to all these definitions, YOGA is having different modes-Bhakti Yoga, Gyan Yoga, Karma Yoga, Buddhi Yoga, Dhayan Yoga, Nad Yoga, Laya Yoga, Siva Yoga, Prem Yoga, Japa Yoga, Mantra Yoga, Yantra Yoga, Kundlini Yoga and many more.
Four main modes of Yoga are accepted in ‘Sadhan-Chatushya’. Mantra Yoga, Hatha Yoga, Laya Yoga and Raj Yoga. Leaving aside all the arguments and counter arguments presented by the various learned scholars of this world, shall define only Hatha Yoga. Hatha Yoga is also explained in two ways-Ashtang Yoga and Hatha Yoga. End result is the same for both the paths, and they are similar too.

Asthang Yoga is narrated in eight parts, namely-

I. Yama- Self restrain, self control, devoted, take care of, moral duty etc

#AhinsaNon voilance. Should not allow any kind of suffering, to any living creature by any means of deeds, words and thoughts.
# Satya-Truth. Persuance of truth, by means of deeds, words and thoughts in all   condition of life.
#Asteya- Do not attempt, to get unauthorized possession of someone else’s articles. Like theft, fraud, bribe and similarly more.
# Aparigraha-Non materialistic. Do not accumulate or collect any article or property, which is not regularly in use or needed utmost.
#Brahamcharya-Continence. Manhood, knighthood, velour, doughtiness, gallantry, braveness, virile, power, energy, courage, toughness, strong and similar other traits are covered under Brahamcharya. But in modern days Brahamcharya is described as, prohibition of all kind of sex, exercising self restrain, specially about sex.  Possess above mentioned traits.

II.Niyam- Self decipline, regularity, regulate.

#Shauch-Purity. Internal (mind) and external (body) cleanness and purity. Under the internal cleanness-Kam-Passion, krodh-Anger, Mada-Pride, Lobha-Greed, Moha-Infatuation, Matsharya-Envy. Under the external cleanness-getup early morning, excrement, mouth wash, clean teeth, bathe, wear clean cloth, always be cleaned and fresh.
# Santosh-contentment. What-ever is experienced or received in life be satisfied with that.
# Sahishnuta-Tolerance.
# Tapa-Perseverance.
# Swadhyaya-Self contemplation.
# Ishwer Aaradhana-Worship of God.

III.Pranayam-Special technique of breathing to gain Vitality.

Pranayam is regulation and control of breathing. Pranayam should be practiced under the strict supervision of well qualified teacher. There are different ways to practice the Pranayam.
Saral Pranayam is simple berathing technique. Breathe in air, hold breathing and then breathe out air and hold breathing again. Slowly and gradually increase the breathing in, hold, breathing out and hold time. Do not exert any kind of pressure, it should go naturally. It must be carried out with utmost ease and care.
Nadi Shodhan. First Breathe in with left nostril, hold breathing and then breathe out with right nostril. Next breathe in with right nostril, hold breathing and then breathe out with left nostril. Go on like this.
Main aim of Pranayam is to inhale maximum oxygen, in turn maximize the blood purification process. Pure blood helps in gaining Vitality.

IV.Asana-posture.

There are many body postures, but Masters of this subject have recommended thirty body postures worth, for practicing Yoga. Any one of them should be mastered. These are Padmasan, Swastikasan, Pithasan, Sinhasan, Kukutasan, Kunjarasan, Kurmasan, Vajrasan, Varahasan, Mrigasan, Chaulikasan, Crochchasan, Nalikasan, Sarvtobhadrasan, vrishbhasan, Nagasan, Matsayasan, Vyagrasan, Ardhachandrasan, Dandavatasan, Shailasan, Khadgasan, Mudrasan, Makarasan, Tripathasan, Kasthasan, Sthanuasan,  Vekarnikasan, Bhoumasan, and Virasan.
There are many hand shapes, but Masters of this subject have recommended nine hand shapes worth, for balancing PachaTatva (Earth, Water, Heat, Air, Space). These are Gyan Mudra, Vayu Mudra, Aakash Mudra, Shunya Mudra, Pruthivi Mudra, Varun Mudra, Apan Mudra, Pran Mudra and Linga Mundra.
The body postures and hand shapes are devised in such a way that maximizes the blood circulation in the body. Good blood circulation is essential for keeping body fit, healthy and agile. Each posture exhibits its own special characteristic, which helps in improving fitness of different body parts and various mental weaknesses.

V.Pratyahar-Divert external stimulus inward.

Eyes, nose, ear tongue and shin perceive external stimulus sight, smell, hearing, taste and touch. Nonchalant all the five senses from their external subjects, and divert them inward.

VI.Dharna-Perceive, notion, belief.

Believe in something, absorb in that belief, adopt the belief and concentrate on that belief.

VII.Dhayan-Meditation

Strong and prolong concentration on that belief. Meditate on it.

VIII.Samadhi-

Divine feeling, Extreme state of mind and body where everything is zero.

Hatha Yoga is narrated in seven parts, namely-

Nath Sampraday’s Hatha Yoga is a fundamental, unparalleled, incomparable, prominent and unique gift to the world. Practice of Hatha Yoga is a effectual resource to keep body healthy and fit, to attain peace and happiness  of mind, to post eternal soul in ultimate state.

I.Shodhan-Purification

Refinement, purification, cleaning or rectification of body is carried out with the help of Shatkarma. Shatkarma are Vasti, Dhoti, Nauti, Nauli, Tratak, and Kapalbhati.

II.Dhrdta-Toughness

Toughness is acquired by Asana

III.Sthaurya-Stability

Stability, firmness and unshakeable is achieved by practicing Mudra and Bandha.

IV.Dhirta-Passionless

Endurance, self-possession, calmness and patience is achieved by Pratyahar.

V.Laghav- Accomplishment

Laghav is acquired with the help of Pranayam.

VI.Pratayaksh Darshan by Dhayan.

Meditation

VII.Nirlipt by Samadhi.

Samadhi is achieved by practicing Shatchkra. Shatchakra are Muladhar, Swadhisthan, Manipurak, Anahat, Vishuddha and Agya.
Volumes have been written on the subject, difficult to sum up in few words, it is only a glimpse. Please feel free to communicate, correct, comment and criticize.
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How many truly know about GOD

परमात्मा

जो  सृष्ठी की रचना , पालन, और संहार करते हैं .

समस्त प्राणी, पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध, मन, बुद्धि, आत्मा, काल और गुण -इन सबके परमार्थिक कारण हैं.

अनन्त ब्रह्माण्ड ही जिनका स्थूल रूप हैं. उससे  सूक्ष्म यह व्यक्त संसार हैं. उससे भी सूक्ष्म ये भिन्न भिन्न रूपधारी समस्त प्राणी हैं. उससे भी सूक्ष्म आत्मा हैं. उससे भी परे जो सूक्ष्म आदि विशेषणों का अविषय, उनका कोई अचिन्त्य परमात्म स्वरूप हैं.

समस्त प्राणियों में जो उनकी गुणश्रय़ा पराशक्ति हैं. जो वाणी और मन के परे हैं. विशेषण रहित हैं. उसी स्वतन्त्र पराशक्ति से प्राणियों के शरीरों में बल आता हैं, तथा इन्द्रियों में ओज (इन्द्रिय शक्ति) और कर्म करने की शक्ति प्राप्त होती हैं. उनसे ही  स्वतः सिद्ध ज्ञान का सन्चार होता हैं.

जिनका कोई नाम अथवा कोई रूप नहीं. जिनके पर स्वरूप को न जानते हुए ही मनुष्य उनके अवतार शरीरों का अर्चन करते हैं.

वो अजन्मा, अनादि, आदिकारण, आदिकर्ता, सर्वव्यापी, सर्वसाक्षी, सर्वगामी, सर्वात्मन, स्वयंप्रकाश, निराकार, अविनाशी, अव्यय, अव्यक्त्त, अक्षर, स्वयंसिद्ध और नित्य हैं.

जिसके समन्ध मैं बड़े बड़े ज्ञानी भी मोहित हो रहे हैं. एक मात्र ज्ञान द्वारा ही उस परम तत्त्व का बोध होता हैं.

उस परम सत्यस्वरूप की मैं वन्दना करता हूँ, उनकी शरण ग्रहण करता हूँ.

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दानवीर या दिखाने के दांत

संसारके धन कुबेरों ने अपने बुद्धि कौशल एवं अथक परिश्रमसे आकुट संपत्ति अर्जित तथा संचितकी हैं . संचित संपत्तिका बड़ा भाग दानमें देकर  अतुलनीय यश प्राप्त किया हैं . इनके मन में मानवीय कष्टों हेतु तीव्र संवेदना हैं . ये संसारके गरीब, वंचित, मजबूर तथा दयनीय मनुष्योंकी प्रगतिमें  सहयोग करने की अभिलाषा रखते हैं.

संसार दो भागों में पाटा गया हैं. धनाड्य तथा गरीब. मेरा धन कुबेरों से विनम्र निवेदन हैं की जिस वस्तु तथा  सेवासे उसकी लागत प्राप्त कर चुके हैं, उस वस्तु तथा सेवाको गरीब देशोंके जन मानसको निःशुल्क अथवा नाममात्रका  शुल्क लेकर उपलब्ध कराएँ. अन्य वस्तु तथा सेवाओं को भी सहयोग शुल्क लेकर उपलब्ध कराये. मानव सेवा करनेकी कामनाको सच्चा चरितार्थ करने का यह भी एक सरल उपाय हो सकता हैं.

यदि आप इस विचारसे सहमत हैं तो इसे प्रचारित, प्रसारित तथा प्रमाणित करनेमें सहयोग प्रदान करे. धन्यवाद.

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